┈┉सनातन धर्म की जय,हिंदू ही सनातनी है┉┈ लेख क्र.-सधस/२०८३/ आश्विन/कृ./१२.-२३००७

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   ⛳🚩॥ *श्री हरि* ॥🚩⛳

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     आरोग्यं परमं भाग्यं, स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्।

        निरोगी तनु यः नित्यं, स एव सुखमश्नुते॥

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                      ☸️ आरोग्यम☸️

                        ⚛️ प्रसाद ⚛️

        प्रकृति से छेड़छाड़ और हमारा भविष्य

यदि प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ को हमने नहीं रोका, तो वह दिन दूर नहीं जब मानव जीवन का सर्वनाश सुनिश्चित हो सकता है।

हमारे पूर्वज प्रकृति के इन अष्ट रूपों—अग्नि, सूर्य, चन्द्र, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश आदि—की आराधना करते थे। यज्ञ, हवन और उपासना के माध्यम से पर्यावरण को शुद्ध एवं सुगन्धित रखने का प्रयास किया जाता था।

आज हमारे कार्य मुख्यतः उद्योग, व्यापार और विकास-केंद्रित हो गए हैं। वाहनों का धुआँ, औद्योगिक प्रदूषण और जहरीली गैसें हमारे जल, वायु और वातावरण को निरन्तर दूषित कर रही हैं। यदि यही चलता रहा तो प्रकृति के ये कल्याणकारी स्वरूप रुद्र रूप धारण करने को विवश होंगे और रोगों एवं प्राकृतिक संकटों का बढ़ना स्वाभाविक है।

शास्त्रों में रोगों के कारणों के विषय में कहा गया है—

«दुस्तोयपानाद्विषमाशनाच्च
दिवाशयाज्जागरणाच्च रात्रौ।
संरोधनान्मूत्रपुरीषयोश्च
षड्भिः प्रकारैः प्रभवन्ति रोगाः॥»

अर्थात् दूषित जल, अनुचित भोजन, दिन में सोना, रात्रि में जागना तथा मल-मूत्र के वेग को रोकना रोगों के प्रमुख कारण हैं। उचित आहार-विहार और स्वच्छ जल के सेवन से हम अनेक रोगों से बच सकते हैं।

आज हमारी लापरवाही के कारण न जल पूर्णतः शुद्ध रहा है, न अन्न। दूषित भोजन और जल के माध्यम से अनेक हानिकारक तत्व हमारे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं।

🌿 प्रकृति—पूज्या से भोग्या तक

हमारे पूर्वज प्रकृति को पूज्या मानते थे। वे सूर्य, अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी आदि की उपासना करते थे। आज हमने प्रकृति को केवल भोग की वस्तु बना दिया है। विकास और प्रगति के नाम पर प्रकृति का निरन्तर दोहन वास्तव में अपने ही विनाश को आमंत्रण देना है।

🙏 अब भी समय है

हमें उन कार्यों से विरत होना होगा जिनसे प्रकृति प्रदूषित और कलुषित होती है। जब प्रकृति के अष्ट रूप पुनः स्वच्छ, निर्मल और संतुलित होंगे, तभी हमारा पर्यावरण और हमारा जीवन स्वस्थ रह सकेगा।

आइए, प्रकृति की रक्षा को अपना कर्तव्य बनाएं और उसके प्रति सम्मान का भाव रखें।

“प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः।” 🙏🌿

प्रकृति की रक्षा ही मानव जीवन और आरोग्य की रक्षा है।

संतुलितं भोजनं नित्यं, व्यायामः जीवनस्य बलम्।  
शुद्धवायु सेवनं चैव, आरोग्यस्य मूलं स्मृतम्॥🙏🚩⛳

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