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राजा चित्रकेतु की कथा: पुत्र-मोह, मृत्यु और आत्मा के शाश्वत सत्य का बोध

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🙏🕉️ जय श्री हरि 🕉️🙏 श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित राजा चित्रकेतु की कथा केवल एक राजा और उसके पुत्र की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमें मोह, ममता, कर्म, जन्म-मृत्यु और आत्मा की नश्वर शरीर से भिन्न सत्ता का गहरा संदेश देती है। 🌺 समृद्ध राजा, लेकिन मन में गहरा दुःख शूरसेन देश के प्रतापी एवं धर्मनिष्ठ राजा चित्रकेतु के पास किसी भी राजसी सुख की कमी नहीं थी। उनका राजकोष स्वर्ण-रत्नों से भरा था, विशाल सेना थी और उनकी अनेक रानियाँ थीं। लेकिन इतना बड़ा साम्राज्य होने के बावजूद राजा का मन सदैव अशांत रहता था। कारण था— संतान का अभाव। राजा दिन-रात यही सोचते रहते— "मेरे बाद इस विशाल राज्य और वंश को कौन संभालेगा? बिना संतान के यह सारा वैभव मेरे लिए व्यर्थ है।" उनका मन पुत्र-प्राप्ति की इच्छा में पूरी तरह डूब चुका था। 🙏 महर्षि अंगिरा का आगमन एक दिन ब्रह्मर्षि अंगिरा राजा चित्रकेतु के महल में पधारे। राजा ने उनका विधिपूर्वक स्वागत और पूजन किया। महर्षि ने राजा के चेहरे पर छाई उदासी देखकर पूछा— "हे राजन्! आपके मुख का तेज फीका क्यों है? राज्य में तो सब कुशल है?" र...

🌸 पञ्चमीक फूल लोढ़ब, मधुश्रावणी आ मिथिलाक भोज: हमर साइर-सारूहक एकादशी व्रतक मजेदार संस्मरण! 🌸

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एकटा पारिवारिक मिलन, अपनापन, संस्कार आ हास-परिहाससँ भरल संस्मरण पञ्चमी दिनसँ मधुश्रावणी धरि मिथिलाक नवविवाहिता कनियाँ सभ साँझ-साँझ फूल लोढ़ैत छथि। ई मिथिलाक बहुत पुरान आ सुन्दर परम्परा थिक। एहि बेर मधुश्रावणीक समापन १५ अगस्त २०२६ केँ होयत। एहि पावनिक अवसर पर हमर सरबेटीक सेहो फूल लोढ़बाक क्रम चलि रहल अछि। एही क्रममे गत ९ अगस्त २०२६, रविवार केँ हमरा अपन कनियाँक संग हमर सारक घर जेबाक अवसर भेटल। संयोगसँ हमर मँझिला बेटा सेहो संगमे छल। सारक घर, विरारमे पहुँचते जे अपनापन आ स्नेह भेटल, तँ मोन एकदम खुश भऽ गेल। लागल जेना मुंबईमे रहितो फेर सँ अपन मिथिलाक ओहि घर-आँगनमे पहुँचि गेलहुँ, जतय अपन लोकक बीच बैसलाक आनन्दे अलग होइत अछि। ❤️🌸 🌺 पञ्चमीक फूल लोढ़ब आ मधुश्रावणी सावन-पञ्चमीसँ प्रतिदिन साँझमे फूल लोढ़बाक परम्परा चलैत अछि। नवविवाहिताक लेल मधुश्रावणी हुनकर पहिल-पहिल पावनि होइत अछि, आ एहि परम्परामे नव दाम्पत्यक सुख, परिवारक मंगल आ सुख-शान्तिक कामना निहित रहैत अछि। हमर सरबेटी नवविवाहिता छथि, आ मधुश्रावणीक ई हुनकर पहिल पावनि थिक। एही लेल ओ अपन नैहर अएलीह छथि आ अपन बरकी बहिन, दीदी आ पिसी सभक संग साँझ...