राजा चित्रकेतु की कथा: पुत्र-मोह, मृत्यु और आत्मा के शाश्वत सत्य का बोध
🙏🕉️ जय श्री हरि 🕉️🙏 श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित राजा चित्रकेतु की कथा केवल एक राजा और उसके पुत्र की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमें मोह, ममता, कर्म, जन्म-मृत्यु और आत्मा की नश्वर शरीर से भिन्न सत्ता का गहरा संदेश देती है। 🌺 समृद्ध राजा, लेकिन मन में गहरा दुःख शूरसेन देश के प्रतापी एवं धर्मनिष्ठ राजा चित्रकेतु के पास किसी भी राजसी सुख की कमी नहीं थी। उनका राजकोष स्वर्ण-रत्नों से भरा था, विशाल सेना थी और उनकी अनेक रानियाँ थीं। लेकिन इतना बड़ा साम्राज्य होने के बावजूद राजा का मन सदैव अशांत रहता था। कारण था— संतान का अभाव। राजा दिन-रात यही सोचते रहते— "मेरे बाद इस विशाल राज्य और वंश को कौन संभालेगा? बिना संतान के यह सारा वैभव मेरे लिए व्यर्थ है।" उनका मन पुत्र-प्राप्ति की इच्छा में पूरी तरह डूब चुका था। 🙏 महर्षि अंगिरा का आगमन एक दिन ब्रह्मर्षि अंगिरा राजा चित्रकेतु के महल में पधारे। राजा ने उनका विधिपूर्वक स्वागत और पूजन किया। महर्षि ने राजा के चेहरे पर छाई उदासी देखकर पूछा— "हे राजन्! आपके मुख का तेज फीका क्यों है? राज्य में तो सब कुशल है?" र...