बिहार की गरीबी: नियति नहीं, नीतिगत असंतुलन का परिणाम
एक राज्य श्रम देता है, पर विकास का हिस्सा नहीं पाता भारत के संघीय लोकतंत्र में यदि किसी राज्य की स्थिति सबसे अधिक विचारणीय और सबसे कम ईमानदारी से समझी गई है, तो वह बिहार है। यह वह प्रदेश है, जिसने भारत को केवल जनसंख्या नहीं दी; उसने देश को श्रम, बुद्धि, राजनीतिक चेतना, प्रशासनिक क्षमता, अकादमिक प्रतिभा और सामाजिक ऊर्जा दी है। इसके बावजूद, विडंबना यह है कि राष्ट्रीय आर्थिक विमर्श में बिहार का स्थान अक्सर उत्पादनकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि आपूर्तिकर्ता के रूप में दर्ज किया जाता है श्रम का आपूर्तिकर्ता, प्रवासियों का आपूर्तिकर्ता, प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रतिभा का आपूर्तिकर्ता, और दुर्भाग्यवश, सस्ते मानवीय संसाधन का भी। यह स्थिति केवल एक क्षेत्रीय विषमता नहीं है; यह भारत के विकास मॉडल पर एक गंभीर टिप्पणी है। सवाल यह नहीं है कि बिहार पिछड़ा क्यों है। सवाल यह है कि इतनी बड़ी जनशक्ति, इतनी प्रखर प्रतिभा और इतनी सामाजिक जीवटता वाला प्रदेश आर्थिक रूप से पीछे रहने के लिए आखिर किन संरचनात्मक कारणों से बाध्य हुआ? विकास का असमान भूगोल भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है उ...