🌿 संत नामदेव जी और “रा” नाम की महिमा 🌿
अहंकार से भक्ति तक की अद्भुत कथा पंढरपुर नगरी में एक अत्यंत धनी-मानी सेठ रहता था। उसके पास अपार धन-संपत्ति थी और वह अपने कल्याण तथा पुण्य प्राप्ति के लिए समय-समय पर तुलादान का आयोजन किया करता था। तुलादान में वह स्वयं एक पलड़े में बैठ जाता और दूसरे पलड़े में सोना-चाँदी, धन-दौलत तौलकर संतों एवं ब्राह्मणों में दान देता। नगर में उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। लोग उसकी दानशीलता की प्रशंसा करते थे, परंतु उसके मन में अपने धन और पुण्य का सूक्ष्म अहंकार भी घर कर चुका था। एक दिन एक वैष्णव भक्त ने उससे कहा— “यदि तुमने जीवन में संत की सेवा नहीं की, तो तुम्हारा दान अधूरा है।” यह सुनकर सेठ ने पहले अपने नौकर को संत नामदेव जी के पास भेजा। नौकर ने जाकर कहा— “सेठ जी आपको दान देना चाहते हैं।” संत नामदेव जी मुस्कुराए और बोले— “हमें किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है।” जब नौकर खाली हाथ लौट आया, तो सेठ ने अपने मुनीम को भेजा। मुनीम ने भी बहुत आग्रह किया, लेकिन नामदेव जी ने वही उत्तर दिया— “यह धन किसी जरूरतमंद ब्राह्मण या गरीब को बाँट दो, हम तो प्रभु नाम में संतुष्ट हैं।” अब सेठ स्वयं संत नामदेव जी के पा...